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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 64

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जो स्वत्मिक है वह गगनतुल्य भी यह कथन विरुद्ध है इस शंकाका निवारण करते हुए कहते है । ब्रह्म के चिद्रूप होने से यह जगत्‌ अकारण ही उसमें उदित होता है ओर उसी में लीन हो जाता है, इसलिए यह निर्मल परमव्योम ही है