Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 197, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 197, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 197 · श्लोक 1, 2
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
एक सौ पचानबेवाँ सर्गं समाप्त
एक सौ छानबेवाँ सर्ग
जिस प्रकार गुरु, शास्त्र आदि से उपदिष्ट उपाय से ब्रह्म की प्राप्ति होती है
वैसे दारू वैवधिकों के आख्यान का संक्षेप में वर्णन ।
वाल्मीकिजी ने कहा : हे महाबुद्धिसम्पनन भरद्वाज, यह कहकर मुहूर्त भर चुप रहकर परमपद मेँ
विश्राम लेकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी ने, जो परमपद में विश्रान्त हो चुके थे अतः परमतृप्त थे,
जानते हुए भी गुरमुख से सुनने के कौतुक से श्रीवसिष्ठमुनिजी से पुनः पूछा