Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 197, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 197, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 197 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
हे सम्मान्य, जो
यह सद् ब्रह्म केवल स्वानुभवमात्र ज्ञेय है वह महान् पुरुषों की वाणी से भी अवाच्य है, क्योकि "यतो
वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" इस श्रुति से वह शब्दप्रवृत्तिनिमित्तधर्म से रहित है