Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
कर्मवृक्षस्य वक्ष्यामि ब्रह्मन्मूलानि मे श्रृणु ।
यन्निकाषेण निर्मूलो न स भूयः प्ररोहति ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तीसरे प्रश्न का उत्तर कहते हैं
हे ब्रह्मन्, कर्मरूपी वृक्ष के मूल मैं आपसे कहता हूँ, आप सुनिये जिनको उखाड़ फेंकने से
(03) क्योकि अपरोक्ष चिति की व्याप्ति के द्वारा ही नाम और रूपात्मक समस्त प्रपंच शिवस्वरूप
है, ऐसा निर्णय कर बाध द्वारा उस स्वरूप मेँ अनायास अवस्थिति हो सकती है ।
निर्मूल होकर यह वृक्ष फिर नहीं पनपता