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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

देहस्तावदयं ब्रह्मन्कर्मवृक्षः समुत्थितः । रूढः संसारविपिने विचित्राङ्गलताञ्चितः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस लोक के कर्मा का मूल शरीर ही पूर्वजन्म के कर्म का विस्ताररूप भी होता हैं, इस दूसरे प्रश्न का भी शरीर का ही कर्मृरक्षरुप से वर्णन करके समाधान देते हैं / हे ब्रह्मन्‌, संसाररूपी जंगल में रोपा गया यह शरीर ही कर्मवृक्षरूप से उत्पन्न है। यह कर्मरूपी वृक्ष विचित्र हाथ, पैर आदि अंगरूपी शाखाओं से विराजमान है