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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

कर्मबीजं तरोरस्य सुखदुःखफलावलेः । क्षणतारुण्यकान्तस्य जराकुसुमहासिनः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

सुख- दुःखरूपी नानाविध फलों की पंक्तियों से समन्वित इस वृक्ष का पूर्व जन्म में किया गया भला या बुरा कर्म ही बीज है । क्षणिक तरुण अवस्था से यह कमनीय दिखाई देता है ओर वृद्धावस्थारूपी फूलों से हँसता है