Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
मनोहंकारबुद्ध्यादिचित्तमेव च तन्मयम् ।
कालाकारक्रियाशब्दशक्तिसंदर्भसंयुतम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जो-जो चिति से भास्य हे कह सक विति का विवर्त होने से चिन्मय-विति-स्वरूप-ही ह उसे
वार अन्तःकरण में क्रमशः दशति हैं /
काल, आकार, क्रिया, नाम और अर्थ से समन्वित मन, अहंकार, चित्त और बुद्धि आदिरूप
सब चिति से भास्य होने के कारण चिन्मय ही (<) है