Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
शिवपङ्कमया एव रूपालोकमनःक्रमाः ।
तन्मयत्वादनन्तत्वादतः किं केन चेत्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
डस प्रकार बराह् इन्द्रिय, इन्द्रियों से जनित ज्ञान तथा ज्ञान के जो विषय हैं उनमें भी
चिद्व्याप्तिग्रयुक्त ही अपरोक्ष प्रकाश हैं, इसलिए उनमें भी विवेकी पुरुष शिवरूपता का ही
अवलोकन करते हैं; इस आशय से कहते हैं ।
बाह्य रूप, रस, शब्द, स्पर्श आदि के आलोचन तथा मनके क्रम यानी बाह्य सविकल्पक ज्ञान
और उपादान बुद्धिर्यो एवं उनके विषय सबके सब शिवरूपी पंकमय हैं ।
यों स्री पदार्थो को शिवरूप देखने पर सम्पूर्ण त्रिपुटीरूप से एकमात्र शिव ही दिखाई देता है,
शिव से अतिरिक्त कोर्ड दूसरी कस्तु इस संसार में देखने में नहीं आती, यह कहते हैं ।
चूँकि इस संसार की सभी वस्तुएँ अनन्त शिवस्वरूप पंक ही हैं, इसलिए कौन किससे प्रकाशित
होता है ?