Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
चितिश्चेतनशब्दार्थभावनावलिता यदि ।
तत्कर्म बीजतामेति नो चेदाद्यं परं पदम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर इसीको स्पष्टरूप से कहते हैं /
यह जीवचेतन जब चेतनशब्दार्थ की भावना से यानी चैतन्यात्मक “मैं ही सब कुछ करता हूँ
इस तरह की भावना से वेष्टित होता है तब कर्मों की बीजता को प्राप्त होता है, अन्यथा अपने परम
सद्रूप पद से स्थित रहता है