Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
तस्माद्वेदनमेवेह कर्म कारणमाकृतेः ।
यदेतत्कर्मणां प्रोक्तं त्वयैवोक्तं मुनीश्वर ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ की प्रामाणिकता की सिद्धि के लिए गुरुवाक्य को ही प्रमाणरुप से उपस्थित करते
हुए श्रीरमचन्द्रजी अब उयत्रहार करते हैं ।
इसलिए हे मुनीश्वर, अपने शरीर आदि में अहंरूपता के आकार की भावना ही इस संसार में
सब कर्मों की कारण है। यह जो मैंने कर्मों का मूल आपसे कहा है, सो आपने ही पहले मुझसे कहा
था, अतः आपके वचन का अवलम्बन करके ही मैंने यह सब आपसे कहा है