Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्य राघव सूक्ष्मस्य कर्मणो वेदनात्मनः ।
कस्त्यागः किमनुष्ठानं यावद्देहमिति स्थितम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
है श्रीरमजी, यह जो आपने कर्मो का मूल मुझे नाया है, इसका त्याग चुपचाप बैठे रहने या
देह का त्याग कर देने से नहीं हो सकता है और न तो कर्मो की निवृत्ति ही आपके द्वारा दिखलाये
ग्रये मार्ग से हो सकती है, इस अभिप्राय से महाराज वस्तिष्ठजी कहते है/
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, जब तक देहरूप उपाधि उपस्थित है तब तक वेदनात्मक
इस सूक्ष्म कर्म का क्या त्याग और क्या अनुष्ठान हो सकता है ?