Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
एतच्चेतनमेवान्तर्विकसत्युद्भवभ्रमैः ।
वासनेच्छामनःकर्मसंकल्पाद्यभिधात्मभिः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह
जीवचेतन ही वासना, इच्छा, मन, कर्म, संकल्प आदि नामवाले ओपाधिक उत्पन्न भ्रमो से
अपने अन्दर संसाररूप से विकसित होता है