Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
प्रबुद्धस्याप्रबुद्धस्य देहिनो देहगेहके ।
आदेहं विद्यते चित्तं त्यागस्तस्य न विद्यते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो प्रतिकिम्ब की हेतु वित्तरप उपाधि का ही प्रकोध से निरास करना चाहिए, इस शंका पर
कहते हैं ।
देहरूपी घर के भीतर स्थित प्रबुद्ध हुए या अप्रबुद्ध हुए इस जीव का देहपर्यन्त चित्त रहेगा
ही, उसका त्याग हो नहीं सकता