Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
जीवतां तस्य संत्यागः कथं नामोपपद्यते ।
केवलं कर्मशब्दार्थभावनाभावने सति ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवन धारण कर रहे प्राणियों के चित्त का भला कैसे
त्याग हो सकता है । इसलिए चुपचाप बैठे रहने या देह के त्याग से सब कर्मों का कभी त्याग
नहीं हो सकता, किन्तु यथा प्राप्त सब व्यवहारो को करते समय भी “असंग, अद्वितीय, कूटस्थ
चिन्मात्रस्वरूप मैं कुछ भी नहीं करता, इस निष्क्रिय आत्मस्वभाव की स्थिति से कर्मशब्दार्थ
की भावना के उत्पन्न न होने पर यत्न के बिना भी कर्म और अकर्मरूपता का विकल्प छूट
जाने से यह कर्म-त्याग स्वयं ही हो जाता है