Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
कर्माकर्मत्वमुत्सृज्य स्वयमेव भवत्यजम् ।
असंभवति संत्यागे कर्मणो यः करोति हि ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे भिन्न किसी दूसरे मार्या से कर्म का त्याग अत्यन्त कठिन हैं, यह कहते हैं /
इससे अन्य दूसरे कर्म त्याग का संभव न होने पर जो केवल अपने शरीर से कर्तव्यता त्यागरूप
(शास्त्रविहित या लौकिक कर्मों को छोड़कर चुपचाप बैठनारूप त्याग) करता है, उसके द्वारा यह
कुछ भी नहीं किया गया समझना चाहिए