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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

जगतस्तं विदुस्त्यागमसङ्गं मोक्षमेव च । वेदनं सति संवेद्ये सर्गादावेव वेद्यदृक् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

बोध से तो वेच्य का ही बाध होता है, केदन का नहीं. फिर उसका बाध कैसे कहते हैं; यदि यह कोई आशंका करे, तो उतर फर कहते हैं । वेद्य (विषयों) के रहने पर ही वेदन होता है । किन्तु यदि सृष्टि के आदि में ही वेद्यदृष्टि उत्पन्न नहीं हुई, तो फिर वह वर्तमानकाल में तो है ही नहीं । इसलिए क्या और कहाँ वेदन है (70) ?