Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
नोत्पन्ना विद्यते नैव तस्मात्किं क्वेव वेदनम् ।
वेद्योन्मुखत्वं संत्यज्य रूपं यद्वेदनस्य वै ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
चिदाभासतारूप वेद्योन्मुखता का परित्याग कर जो वेदन का शुद्ध चिदात्मकरूप
अवशिष्ट रहता है वह द्वैतवेदन नहीं है, क्योकि वह कर्म-क्रिया नहीं है, जिससे कि "विद्" धातु
से भाव में “ल्युट् प्रत्यय करने पर जो "विद्" धातु का अर्थ होता है वह हो। किन्तु वह शांत
ब्रह्म ही है, ऐसा तत्त्वज्ञानी लोग कहते हैं