Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अहंममेत्यतः सारान्नेतरत्परमेश्वरात् ।
असंसक्तमतिस्तिष्ठ हा शिलोदरमौनवत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अह ओर भम“ /मैं और मेरा) इन दो रुपों से ही सम्पूर्ण विवर्तो का संग्रहकर फिर ये सभी
वस्तु विति से व्याप्त है" इस तरह से उनमें विति-व्याप्ति की भलीभाँति आलोचना करने पर
एकमात्र विति के ही स्रारुप से बच जाने के कारण उसमे स्थिति चुलभ हो जाती हैं, इसी अभिप्राय
से कहते हैं ।
चूँकि हे श्रीरामचन्द्रजी, सारभूत परमेश्वर से भिन्न "अहं" "मम इत्यादि विवर्त कुछ भी नहीं है,
(८) सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि चिति का चेत्य (विषय) की ओर उन्मुख होनेरूप
जो मनन है वह चिति से व्याप्त ही है । तदनन्तर विषयों का अभिमान, अध्यवसाय, स्मरण, काम
ओर संकल्प आदि जो वृत्तियाँ उदित होती हैं वे भी चिति से व्याप्त ही उदित होती हैं, यह
सवरनुभवसिद्ध है तथा चिति और चेत्य का सम्बन्धरूप काल,विषयों का आकार, उसकी क्रिया-
इस प्रकार नाम और अर्थ के सहित जो सम्पूर्णं अन्तःकरण का संसरण है वह भी साक्षात् साक्षी
से वेद्य होने के कारण शिवमय ही है, यह प्रत्येक विद्वान् को जान लेना चाहिए ।
इसलिए संसक्तमति न होते हुए यानी स्त्री, पुत्र आदि विषयों मेँ तनिक भी आसक्ति न रखते हुए
आप शिला के उदर में प्रसिद्ध वाणी आदि चेष्टाशून्य मौन के समान स्थित (77) रहिये