Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पृच्छामि यदहं तत्त्वं कथयाशु ममानघ ।
यदि जानासि तत्त्वेन कर्म तावत्किमुच्यते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्रचमुच आपका नैष्कर्म्या सिद्ध हो जाय, यदि अज्ञानरूप मूल के साथ आप कर्मों का त्याय कर
सके / परन्तु मूल का त्याग करना तो अत्यन्त ही कठिन है, यह दिखलाने के लिए महाराज
वशिष्ठजी-श्रीरमचन्द्रजी मुझसे कर्मों का मूल क्या हैं! इसका निश्चय कर पूछ रहे हैं या यों ही
पूछ रहे हैं- इसकी परीक्षा करने के लिए हे श्रीरमजी, आपने कर्मों का स्वरूप कसे निश्चित किया
है, उनका फलात्मक विस्तार कैसा हैं, उनका मूल क्या है, उनमें नाश योग्य अंश और उसका
उपाय आपने केसा निश्चित किया हैं- यह पूछतें हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप श्रीरामजी, मैं आपसे पूछ रहा हूँ उसे शीघ्र कहिये ।
यदि वास्तव में आप जानते हों, तो कहिये, कर्म किसे कहते हैं ?