Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 2, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
विस्तारः कर्मणः कीदृङ् मूलं तस्य च किं भवेत् ।
नाशनीयं च निपुणं कथं कथय नाश्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्म का विस्तार कैसा है,
उसका मूल क्या है और उसके किस अंश का नाश किया जाता है ? यानी उसका नाशनीय अंश
कौन है ? और वह किस तरह नष्ट होता है। यह भी अच्छी तरह कहिये