Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 20, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
जीवसंविदथैषान्तर्यदुपायाति पञ्चताम् ।
न तत्र कारणं किंचिद्विद्यते न च कार्यता ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्तर यह जीव चिति उस वीर्य में पंचभूतात्मक
देहरूपता को धारण करती है, यही इसकी उपहितता है, ऐसी स्थिति में उसमें न तो कोई कारणता
है और न कोई कार्यरूपता ही है