Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 20, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
जगज्जृम्भिकया जीवः स्वमैक्यं द्वित्वमास्थितः ।
स्पन्दशक्त्येव पवन आवृतात्मा न पश्यति ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् के रूप में वर्धित अविद्याशक्ति के प्रभाव
से तिरस्कृत अतएव अपनी एकता की द्रैतरूप में (द्रष्टा -द्रश्यरूप में) कल्पना कर उसीमें अभिनिवेश
करके जीवात्मा बैठा रहता हे । इसीलिए पवन जैसे अपनी स्पन्दनशक्ति नहीं देखता, वैसे ही
अविद्याशक्ति से आवृत वह आत्मा अपने स्वरूप को नहीं देखता