Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 20, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अज्ञानस्य महाग्रन्थेर्मिथ्यावेद्यात्मनोऽसतः ।
अहमित्यर्थरूपस्य भेदो मोक्ष इति स्मृतः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस्रीलिए विद्या से अविद्या का विनाथ सम्भव होने के कारण अनिर्मोक्ष दोष नहीं आ सकता,
यह कहते हैं /
मिथ्या विषयरूप, असत् तथा “अयम्' रूप अज्ञानरूपी सबसे बड़ी गाँठ का जो भेदन है, वही
मोक्ष है, यह मुनियों द्वारा कहा गया है