Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 20, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
व्यपगतघनचेतनः समन्तादहमिति नूनमबुध्यमान आस्व ।
अनभिधघनचेतनैकरूपः क्षितसदसत्सदसत्सदोदितश्च ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए हे श्रीरामजी, सबसे पहले आप अज्ञानरूप
घनमेघ से छुटकारा पाये हुए चैतन्य प्रकाशरूप बन जाइए, फिर अपने को अहंकार की उपाधि से
परिच्छिन्न न समझिए यानी शोधित त्वंपदार्थरूप हो जाइए, फिर मूर्त, अमूर्तं और मूल अज्ञान के
बाध से युक्त निरन्तर उदितस्वभाव होकर नामशून्य, आनन्दैकरसघन एकमात्र चेतनरूप (शोधित
तत्पदार्थरूप) हो जाइए ओर इस प्रकार होकर आप चारों ओर से पूर्ण बनकर स्थित रहिए