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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 200, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

निर्विकल्पसमाधानसमतां समुपागते । शान्तस्वच्छमनोवृत्तौ सर्वस्मिंश्च सभाजने ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

खूब अभ्यस्त कर्म करने मे मुक्त पुरुषों को कोई श्रम नहीं होता और कर्मत्याग का कोई प्रयोजन नहीं है अतएव लोकानुग्रहवश वे कर्म-त्याग नहीं करते हैं, ऐसा कहते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जिस महापुरुष की यह हेय है यह उपादेय है यों दोनों हेयोपादेय दृष्टियाँ क्षीण हो चुकीं उसका नित्यनैमित्तिक क्रिया के त्याग से क्या प्रयोजन है अथवा क्रिया के संश्रयण से क्या प्रयोजन है ? यानी उसके लिए कर्मत्याग और कर्मसंश्रयण दोनों समान हैं