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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 200, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

सत्त्वकोटिमुपारूढे परां पावनतां गते । संवित्तत्त्वे समग्रस्य जनस्य श्रुतशालिनः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जो ज्ञानी को कष्टप्रद हो ऐसी हेय वस्तु यहाँ नहीं है तथा जो तत्त्वज्ञानी का संश्रयणीय हो यानी अवश्य अनुष्ठातव्य हो ऐसी उपादेय वस्तु भी नहीं है क्योकि "नेह नानास्ति किंचन' श्रुति के अनुसार उसकी दृष्टि में परब्रह्म के सिवा दूसरी वस्तु है ही नहीं