Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 200, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
मन्दारादिमहापुष्पच्छन्नच्छादनसंचयाम् ।
पारिभद्रलतागुच्छनीरन्ध्राजिरभूमिकाम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई स्वदेश रहित हैं, किन्हीं ने विक्षेपनिवृत्ति के लिए अपने घर-
द्वार का त्याग कर दिया है, कोई लोग एक स्थान में (अपने घर में) ही रत (प्रीतियुक्त) हैं यानी सब
लोगों की अनुकूलता द्वारा विक्षेपशून्य हैं तथा कोई सदा इधर उधर भ्रमण करते हुए स्थित हैं