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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 200, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 200, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 200 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

तथा सभास्थितानां च मुनीनां भावितात्मनाम् । गाधेयप्रमुखानां च साधुवादगिरोच्चया ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवित-शरीर में चेष्टा होना अवश्यम्भावी होने पर खूब अभ्यस्त सदाचाररूप चेष्टा ही उसके शरीर में होती है, ऐसा कहते है। हे श्रीरामचन्द्रजी, यह शरीर आयुपर्यन्त अवश्य ही चेष्टा करता है इसलिए वह यथाप्राप्त चेष्टा बिना हिचकिचाहट के करे । चेष्टा के त्याग से और अन्यथा चेष्टा से क्या करना है ?