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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 33–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 201, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

दिष्टया जातो विशोकस्त्वं दिष्ट्या सम्यगवस्थितः । दिष्टया लोकद्वयेऽनर्थशङ्का ते शममागता ॥ ३३ ॥ दिष्टया रघूणां तनय संज्ञः पावितवानसि । भूतभव्यभविष्यस्थां बोधेन कुलसंततिम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

दोनों लोकों में यानी स्वर्ग ओर भूतल में भोग के लिए जिसका मेने संचय किया है उस सुकृत से, पुत्रकलत्रसहित अपने शरीर से तथा सम्पूर्ण चाकर ओर सामन्त सहित सारे राज्य से मैं आपकी पूजा करना चाहता हूँ जिनका मेँ आपको समर्पण कर चुका हूँ । हे भगवन्‌, यह सब मेने आपको अर्पण कर दिया हे । आपके आश्रम की तरह यह आपके अधीन है । आप स्वामी बनकर अपनी इच्छा से मुझे आदेश दीजिये