Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 201, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
अधुना मुनिनाथस्य विश्वामित्रस्य राघव ।
पूरयित्वार्थितां भुक्त्वा पित्रा सह महीमिमाम् ॥ ३५ ॥
त्वयान्विताः सतनयभृत्यबान्धवाः पदातयः सरथंगजाश्वमण्डलाः ।
निरामया विगतभयाः स्थिरश्रियः सदोदयाः सुभग भवन्तु राघवाः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे भूपते, हम ब्राह्मण लोग केवल प्रणाम से सन्तुष्ट है | केवल प्रणाम से ही
हमारी तुष्टि होती है ओर प्रणाम आप कर ही चुके हैं । राज्य की रक्षा करना आप ही जानते हैं ओर
यह आपको ही शोभा देता है । यहाँ यह राज्य आपका ही रहे । तपस्यारत ब्राह्मण कहाँ महीपाल
होते है