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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 201, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 201, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 201 · श्लोक 37

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

दशरथजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, इस परम पुरुषार्थरूप मोक्ष के प्रदानरूप महान्‌ उपकार के लिए प्रत्युपकाररूप दीयमान राज्य कौन सी वस्तु है, क्योकि मानुषानन्द की परम अवधि है निष्कण्टक वित्तपूर्णं निरामय सप्तद्वीप का आधिपत्य । उससे सौ गुना अधिक मनुष्यगन्धर्वो का आनन्द है, इससे भी सौ गुना अधिक देव-गन्धर्वो का आनन्द है इस प्रकार उत्तरोत्तर उत्कृष्टता को प्राप्त हो रहे विषयानन्दो में हिरण्यगर्भं का आनन्द चरम सीमा है । वह सर्वोत्कृष्ट हिरण्यगर्भानन्द भी जिस मोक्षानन्दसमुद्र मे सीकर (जलकण) तुल्य है उसके लिए इसकी क्या गणना है, इसलिए हे मुनिवर उसके लिए इसे देने में मुझे लज्जा मालूम होती है, इसलिए हे देव, जैसा आप समझिये वैसा कीजिये