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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 202, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 23

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार से स्थित हुए मुझे, अज्ञानियों के अभिमत बन्धु. जन, राज्य आदि के नाशो से अथवा, वृदि , हास आदि अवस्थाओं से अनर्थप्राप्ति की आशंका नहीं है, इस आशय से कहते हैँ । चाहे यह सृष्टि उलट जाय अथवा प्रलयकाल के पवन बहे, चाहे देश सोममार्ग के समान जनशून्य हो जाय लेकिन मेँ निर्विक्षेपरूप से अपनी आत्मा में स्थित हूँ