Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 202, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 24
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हिन्दी अर्थ
हे मुनिवर, मैं आत्माराम हूँ, बाह्य
इन्द्रियों से अलक्ष्य हूँ, मन से भी दुर्लक्षय हु, निरामय हूँ, आशाओं से मैं वैसे ही बन्धन को प्राप्त नहीं
होता जैसे कि मुष्टियों द्वारा आकाश बन्धन को प्राप्त नहीं होता