Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 202, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 31-33
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हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह बड़े सौभाग्य का विषय हे कि आपने आदि, मध्य और
अन्त रहित वह महापुण्य सर्वश्रेष्ठ पद पा लिया है जिस पद में स्थित हुए पुरुषों को पुनः शोक-दुःख
नहीं रहता । आप अत्यंत सम (विषमतालेशशून्य) शीतल स्वात्मा में जैसे आकाश शान्त आकाश में
विश्राम प्राप्त करता है वैसे ही पूर्ण विश्रान्ति को प्राप्त हुए हैं । बड़े हर्ष की बात है आप सर्वथा शोक
दुःखशून्य हो गये हैं, बड़े आनन्द का विषय है कि आपको उत्तम स्थिति प्राप्त हो गई है एवं महासौभाग्य
की बात है कि आपकी इस लोक और परलोक में दृष्ट, अदृष्ट और श्रुत अनर्थशंका की निवृत्ति हो गई
है