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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 203, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 203, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 203 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

सूर्यकान्तवरोत्थेन वह्निनेव समेधिते । द्विगुणं प्रज्वलत्यर्कशून्ये गगनधामनि ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

आपके अनुग्रह से आज मुझे यह दिव्य साम्राज्यपदवी प्राप्त हो चुकी है जिसमें स्थित हुए मेरे लिए यह सारा जगत्‌ अमृत बन गया है