Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 30–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 204, verses 30–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 30-33
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
वह त्वरायुक्त सभा से उठने का समय
अत्यन्त सुशोभित हुआ जिसमें घुटनों तक देवताओं द्वारा वर्षाये गये फूलों से चारों ओर कीचड़ हो
गया था, परस्पर घिसने और टकराने से केयूरों (अंगदों) में जड़े हुए रत्नों के चूरे से पृथ्वी लाल
हो गई थी, टूटे हुए हारों से स्फुरित हो रही मोतीरूपी तारिकाओं ने रात्रिकाल में प्रसिद्ध नक्षत्रयुक्त
आकाश को जीत लिया था, देवर्षि, मुनि, ब्राह्मण तथा राजाओं के इधर उधर संचार, से जो अत्यन्त
भीड़भाड़वाला था, व्यग्र सेविकाओं के हाथों में चँवर केशों से चंचल थे, वसिष्ठजी द्वारा उपदिष्ट
ज्ञान के क्रम के मनन आदि द्वारा भूमिका के क्रम से प्रमेयीकरण के लिए ही स्पन्दमान, अन्य
स्वार्थत्वरा से नहीं, इस कारण जो दारूण न था, कभी जरा सा धक्का लगने पर भी परस्पर
क्षमायाचना के लिए सिर में अंजलि बाँधे हुए आगे और अगल बगल तीनों भागों में देखने तथा क्षमा
माँगने के लिए प्रवृत्त नेत्र और जीभवाले सकल जनों से विराजित था, पागल निष्ठुर लोगों से विषम
नहीं था, इसलिए वहाँ पर पीड़ा आदि दोषों का लेष भी न था