Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 204, Verses 41–45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 204, verses 41–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 204 · श्लोक 41-45
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हिन्दी अर्थ
इसके अनन्तर करवीर और कुसुम्ब के सदृश किरणों से
दिशाओं को लाल बना रहे बाल सूर्य आकाशरूपी सागर में प्रविष्ट हुए राजा, राजकुमार, मन्त्री
लोग तथा श्रीवसिष्ठ आदि मुनिगण फिर महाराज दशरथ की सभा में आये । अपने-अपने क्रम,
स्थान, देश और आसन के अनुसार जैसे आकाश में नक्षत्र शोभा प्रविष्ट होती है वैसे ही वहाँ पर
वह सभा प्रविष्ट हुई । तदनन्तर दशरथ आदि भूपालों तथा सुमन्त्र आदि मन्त्रियों के आसन पर
आसीन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी की प्रचुर स्तुति करने पर महामुनि वसिष्ठजी तथा अपने पिताजी के
सन्मुख कमलनयन श्रीमान् श्रीरामचन्द्रजी ने यह मधुर वचन कहा