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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 205, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एवं यथैतद्भगवन्स्वप्ने दृश्यं परं नभः । तथैव जाग्रतीत्यत्र न चेत्संदेहजालिका ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महावाहो, हे श्रीरामचन्द्रजी, फिर मेरा परम संक्षिप्त (युक्तियों से स्पष्ट तथा दृश्य के परिमार्जन का उपदेशक होने के कारण उत्कृष्ट) वचन सुनिये, क्योकि बार-बार खूब पोंछने से दर्पण अत्यन्त शोभित होता है

सर्ग सन्दर्भ

ढो सौ तीनवाँ सर्ग समाप्त दोसौ चारवाँ सर्ग श्रीवसिष्ठजी तथा श्रीरामजी का चिदात्मा के परिशोधन के लिए निष्कृष्ट युक्ति से फिर चित्‌ में दृश्य का परिमार्जन करना |