Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 205, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
इदं मे भगवन्ब्रूहि महाप्रश्नमनुत्तमम् ।
कथं भवत्यदेहा चिज्जाग्रत्स्वप्न स्वदेहवत् ॥ २ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
दृश्यं जाग्रत्यथ स्वप्ने खाधारं खात्मकं खजम् ।
खं च नान्यत्परं जातु संदेहोऽस्त्युपपत्तितः ॥ ३ ॥
समस्तकारणाकारप्रत्यस्तमयरूपिणि ।
सर्गादावेव भूतानि संभवन्ति न कानिचित् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
है और स्मरण के समान पदार्थशून्य स्वरूप होकर सामने आता है, इसलिए वह संविद् संवेदनमात्र
होकर अन्य आकार की भाँति विस्तृत है उसमें संवित् से अतिरिक्त कुछ नहीं है । जैसे प्रत्यक् चैतन्यरूप
मुझ में स्वप्नजगत्रूप निर्मल संविदाकाश सरूप होता हुआ भी नीरूप है वैसे ही त्रिभुवन भी सरूप
होता हुआ भी नीरूप है