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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verses 5–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 205, verses 5–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

पृथ्व्यादिनियतस्तेन देहोऽयं नास्ति किंचन । भूतान्येव किलैतानि देहस्तानि न सन्त्यलम् ॥ ५ ॥ तेन स्वप्नवदाभासमिदं पश्यति चिन्नभः । स्वरूपमात्रकचनमाकारवदिवाकुलम् ॥ ६ ॥ भानमाभानमात्रत्वमिदं यत्तच्चिदात्मना । नभसा स्वप्नशब्देन कथ्यते जगदाकृतिः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, चित्‌ में यह भूमि कैसे संपन्न हुई, पर्वत कैसे सम्पन्न हुए, कैसे जल हुआ, कैसे पत्थर हुए, कैसे तेज हुआ, कैसे क्रिया हुई, कैसे काल हुआ, कैसे वायु हो गया और कैसे चिदाकाश हो गया यानी चित्‌ मेँ जडता ओर भूमि आदि विचित्रता केसे हो गई ? यद्यपि यह सब मैं आपके उपदेश से जान चुका हूँ, मेरे विशद बोध के लिये फिर मुझसे कहने की कृपा कीजिये