Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 205, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 205, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 205 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
काश्चिद्व्योमस्थभूपीठा ऊर्ध्वाधस्थविनिश्चयाः ।
बुध्नाकाशादूर्ध्वखुरा लम्बमानवनाचलाः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
पृथिवी आदि आकारसम्पक्ति को मानकर यह कहा गया है, वास्तव में पृथिवी आदि सम्पत्ति भी
नहीं है, ऐसा कहते है ।
यह पृथिवी आदि कुछ भी सम्पन्न नहीं हुए यह संवित् के अतिरिक्त, सत् नहीं हैं । यह
जगदाकार चित् का स्फुरण स्वप्न के समान मन ही उस प्रकार (जगत् के रूपसे) स्थित हे, उससे
अतिरिक्त नहीं है