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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 1, 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदकारणकं भाति भानं तन्नैव किंचन । तत्तथा परमार्थेन परमार्थः स्थितोऽनघ ॥ १ ॥ अत्रेमं केनचित्पृष्टोऽयमहं तं महामते । सम्यग्बोधस्य पुष्ट्यर्थं महाप्रश्नं परं श्रृणु ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

न यह कभी उत्पन्न हुई, न स्थित है और न नष्ट हुई यह केवल चिन्मात्र ही है । इस प्रकार जगत्‌ की स्वप्न के समान पूर्वोक्त विवर्तमात्रता का स्वीकार कर कूटस्थ अद्वितीय चिन्मात्र विवर्त का भी संभव नहीं है, क्योकि उसका कारण नहीं है, ऐसा श्रीरामचन्द्रजी प्रश्न करते है। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जैसे परमाकाश स्वप्न में दृश्यरूप होता है वैसे ही यह जाग्रत्‌ में दृश्यरूप होता है इस विषय में यदि सन्देह नहीं है तो यह सर्वश्रेष्ठ महाप्रश्न मुझसे कहने की कृपा कीजिये । अदेह चिति जाग्रत्रूप स्वप्न में सदेहवत्‌ कैसे होती है ?

सर्ग सन्दर्भ

दो सौ चारवाँ सर्ग समाप्त दोसौ पाँचवाँ सर्म केवल विषयमात्र स्वरूपवाली यह जगत्‌ स्थिति स्वप्नतुल्य है ।