Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
तुल्यकालमनुप्राप्तैः सहस्रेन्दु न किं नभः ।
अन्यच्च ध्यायिनां लक्षैर्ध्यातैका स्त्री यथाक्रमम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति ही भ्रान्त वेतन को तथा उस उस रूप से स्थित-सी प्रतीत होती है वस्तुतः वह उस रूप में
नहीं है, ऐसा कहते हैं।
चिति ने जिस पदार्थ का जिस प्रकार जहाँ पर चिन्तन किया वह उस प्रकार वहाँ चित्तत्त्व में
पर्वत, नदी आदि के रूप में पूर्णतया स्थित हैं