Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verses 28–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verses 28–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 28-34
संस्कृत श्लोक
जायात्वेन समं कालं लब्धं ध्यानफलं च तैः ।
साध्व्यसाध्वी गृहे भर्तुः संस्थिता तपसा परा ॥ २८ ॥
तेषां च जाया संपन्ना कथमेतन्महामुने ।
गृहानिर्गच्छमाकल्पं नृपः स द्वीपसप्तके ॥ २९ ॥
वरत्वं वरशापाभ्यामिति अन्तः क्व तिष्ठति ।
दानधर्मादितपसामौर्ध्वदेहिककर्मणाम् ॥ ३० ॥
इहस्थानाममूर्तानां मूर्तं प्रीत्यास्ति सत्फलम् ।
व्यवहर्ता न मूर्तोऽत्र विद्यते लोकयोर्द्वयोः ॥ ३१ ॥
देशान्तरे भृशं जीवो भृशं कालान्तरेऽपि वा ।
फलं संभवतीयत्तद्विनानुभवनं मुने ॥ ३२ ॥
असमञ्जसमेवाति कथं स्यात्सुसमञ्जसम् ।
इत्यादिसंशयगणं गिरा शीतावदातया ।
छिन्धि मेऽभ्युदितं भासा सान्ध्यमान्ध्यमिवोडुपः ॥ ३३ ॥
परमवस्तुनि संशयनाशनादुभयलोकहितं भवति स्फुटम् ।
तदिह मे कुरु साधुसमागमस्तनुफलो भवतीह न कस्यचित् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में अशिला ही शिला होती है,
अनाकाश ही आकाश होता है यानी शिला तथा आकाश से अतिरिक्त चैतन्य ही शिला ओर आकाश
होता है वैसे ही यहाँ सर्गादिरूपी स्वप्न में चेतन में दृश्य की (जगत् की) स्थिति है। निराकार शान्त
चिति जिस स्वस्फुरण को ही स्वप्न के समान जानती है वह जगत् कहा जाता है, अतः चिद्रूप जगत्
निराकार ही है यह बात मैं आपसे शतशः कह चुका हूँ। जैसे वायु के अन्दर स्थित स्पन्द एकमात्र
केवल वायु ही है वैसे ही यह ब्रह्म में ब्रह्म है यह न तो उदित होता है और न शान्त होता है। जैसे
जल में द्रवत्व रहता है, जैसे आकाश में शून्यत्व और जैसे पदार्थ में पदार्थत्व रहता है वैसे ही ब्रह्म
में यह जगत् है। न तो यह प्रलय में तिरोहित होता है अथवा न सर्गादि में जगत् के अकारण ब्रह्म
से निष्कारणक उत्पन्न हुआ है । ब्रह्मपद में यह जगत् न तो अभिन्न है अथवा न भिन्न ही है। अनादि
निराभास निराकार चिदाकाश अन्य (विसदृश, जड़) सर्गदृष्टियों का कारण कदापि नहीं हो सकता
है । इसलिए जैसे अवयवी के (अंगीके) अवयव (अंग) केवलस्वात्ममात्र हैं यानी उससे पृथक् नहीं
हैं वैसे ही निरवयव (अखण्ड) ब्रह्माकाश में जगत्रूपी आकाश स्थित है ब्रह्माकाश से जगदाकाश
पृथक् नहीं है