Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verses 36–37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verses 36–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 36,37
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
शान्त निराधार ज्ञप्तिमात्र दृश्य का आभास होने में दृष्टान्त देते हैं।
मनोपंख से कल्पित नगर के तथा स्वप्न में दृष्ट नगर के वृतान्त के समान सारा दृश्य फैला है।
वास्तव में विषमताशून्य, शान्त, अजन्मा अविनाशी ब्रह्माकाश ही दृश्य के रूप में स्थित है । परम
चिदाकाश स्वच्छ, चमकदार, सारभूत स्वरूप ही चित्स्वभाव होने के कारण भ्रमवश जिस जिस आकार
में पूर्णरूप में विकसित होता है -स्फुरित होता है-उसी स्वकल्पित आत्मरूप को प्रलयपर्यन्त उसी ने
(चिदाकाश ने ही) जगत् के रूप से जाना है अन्य को नहीं