Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
श्रृणु राजन्यथा स्पष्टमेतत्ते कथयाम्यहम् ।
येन ते सर्वसंदेहा यास्यन्त्यलममूलताम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, श्रीरामचन्द्रजी, विना कारण के जिस जगद्भान का स्फुरण होता है
वह कुछ भी है ही नहीं । वास्तव में परमार्थभूत ब्रह्म ही जगत् के रूप में स्थित है
सर्ग सन्दर्भ
दो सौ ्पौँचर्वौँ सर्ग समाप्त दोसौ छठवाँ सर्ग बरह्म ही सत् है जगत् की सत्ता नहीं है इसके निर्णय में कारणभूत कुशद्रीपेश्वर द्वारा कथित प्रश्नों का निरूपण ।