Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
तत्रास्तीलावती नाम हैमी पूर्वोत्तरे पुरी ।
दीप्तिज्वालामयस्तम्भप्रोतावनिनभस्तला ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
विर्वत में अनुत्पत्ति का ही उपपादन करते हैं।
समस्त कारणाकारों मे अस्तमयरूपवाले सर्गादि में ही कोई भूत उत्पन्न ही नहीं होते यानी उस
समय पृथिवी आदि किसी भूतका संभव नहीं हे