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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 206, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

केनचित्कारणेनाहं कदाचित्तस्य भूपतेः । प्राप्तः समीपं नभसः प्रलयार्क इव च्युतः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अतः विवर्तपक्ष निर्दोष है यह कहते हैं। इसलिए चिदाकाश स्वप्नवत्‌ प्रतीत होनेवाले स्वरूपमात्रस्फुरणरूप जगदादि आकारवान्‌ जैसे मायागुण से विश्षुब्ध इस दृश्य को देखता है