Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
संकल्पनगरे यद्यद्यथा संकल्प्यते तथा ।
तत्तथास्त्येव च तदा त्वत्संकल्पपुरे यथा ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, जगत् पहले असत् था पश्चात् सत् हुआ जेसे-“असद्रा
इदमग्र आसीत् ततो वै सदजायत (यह पहले असत् ही था), “सदेव सोम्येदमग्र
आसीदेकमेवाद्वितीयम्" (हे सोम्य, यह पहले एक अद्वितीय सत् ही था) इत्यादि श्रुतियों की परस्पर
संगतार्थता (एकवाक्यता) केसे हुई यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये । ओर सुनिये, सृष्टि के
आरम्भ में शून्य आकाश से यह ब्रह्म कैसे होगा यदि आकाश का ऐसा प्रभाव मानें, तो इस तरह
के प्रभाववाले सब प्रदेशों में भिन्न आकाश से सब जगह अन्य ब्रह्म क्यों नहीं पैदा होते ?
हे मुनिश्रेष्ठ, ओषधियों के अपने अपने पदार्थो के उष्णत्व आदि स्वभाव कैसे स्थित हैं यह
मुझसे अपने बोध के अनुसार कहने की कृपा कीजिये