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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 207, Verses 23–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 207, verses 23–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 207 · श्लोक 23-28

संस्कृत श्लोक

तस्माद्देहस्य नियतौ यथेतौ ब्रह्मणा चिता । स्पन्दास्पन्दौ कल्पितौ द्वौ स तथैवानुभूतवान् ॥ २३ ॥ महाप्रलयपर्यन्ते पुनः सर्गः प्रवर्तते । समस्तकारणाभावाद्द्रव्यं तावन्न विद्यते ॥ २४ ॥ विमुक्तत्वात्प्रजेशस्यन च संभवति स्मृतिः । ब्रह्मैवेयमतो दीप्तिर्जगदित्येव भासते ॥ २५ ॥ तस्मादाद्यात्मना भातं स्वमेव ब्रह्मणा स्वतः । जगत्संकल्पनगरमिति बुद्धं च खेन खम् ॥ २६ ॥ यथा संकल्पनगरं चिन्मात्रं भाति केवलम् । तथैवाकारणं भाति चिन्मात्रोन्मेषणं जगत् ॥ २७ ॥ शरीरमस्तु वा मास्तु यत्र यत्रास्ति चिन्नभः । वेत्त्यात्मानं तत्र तत्र द्वैताद्वैतमयं जगत् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, एक ही पुरुष के मित्र ने प्रयाग आदि मनोवांच्छित फल देनेवाले क्षेत्र मे उसके जीवन की कामना कर मृत्यु का आलिंगन किया और शत्रु ने वहीं पर उसके मरण की कामना कर अन्तिम साँस ली दोनों के मरण के पश्चात्‌ विरुद्ध स्वभाव वाले कार्य कैसे होंगे यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये । तथा एक ही समय में “में आकाश में पूर्ण चन्द्रमा होऊँ इस कामना से चन्द्रत्व प्राप्त करानेवाली उपासनाविधि के अनुसार ध्यान करनेवाले बहुत से उपासका द्वारा एक ही काल में प्राप्त अवश्यम्भावी चन्द्रत्वप्राप्तिरूप फलों से आकाश एकसाथ अनेकों चन्द्रो से युक्त क्यों नहीं होता ? तथा एक ही स्त्री का अपनी स्त्री के रूप में प्राप्त करने के लिए जब लाखों पुरुषों ने एक साथ ध्यान किया तब उन पुरुषों के ध्यान की फलभूत वह एक ही स्त्री उन पुरुषों को भिन्न देश में स्थित भिन्न भिन्न घरों मेँ एक ही समय केसे प्राप्त हुई ? तथा हे महामुनिजी, वह एक ही स्त्री अपनी तपश्चर्या से परम ब्रह्मचारिणी, उनमें से प्रत्येक पति के घर में रहने से प्रत्येक के प्रति तपस्या से साध्वी एवं बहुजन भोग्य होने के कारण असाध्वी कैसे तथा वह उन सबकी स्त्री कैसे हुई यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये